• इतिहास के आइने में बाजपुर

    बाजपुर के इतिहास में इतिहासकारो का मत है कि इसकी स्थापना चन्द्र वंशीय राजा, बाजबहादुर ने की थी, जिनका कार्यकाल सन् 1638 से सन् 1678 तक रहा। राजा बाज बहादुर एक प्रतापी और जनप्रिय राजा थे। उनके विषय में भी कुछ जानकारी अपेक्षित हैं। राजा बाजबहादुर से पूर्व राजा त्रिमलचन्द्र चंद्र वंश के राजा थे। उनसे पूर्व राजा विजय चन्द्र राजा थे। राजा विजय चन्द्र के समय में जो मारकाट हुई, उसमें बहुत से लोग मारे गये थे। कुछ लोग भाग गये थे। उनमें कुँवर नील गुँसाई भी एक थे। किंवदन्ती है कि कुँवर नील गुँसाई को उनके विरोधियों ने अंधा कर दिया था। इन्हीं का पुत्र बाजा या बाजबहादुर था, जिसका पालन-पोषण एक पुरोहित धर्माकर तिवारी की पत्नी ने किया था। राजा त्रिमलचन्द्र की कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण उन्हें राज्य के उत्तराधिकारी की खोज करने को विवश होना पडा। खोज के दौरान ही उन्हें पता चला कि पुरोहित धर्माकर तिवारी के यहाँ चन्द्र वंश के नील गुँसाई के पुत्र बाजा अथवा बाज बहादुर का पालन-पोषण हो रहा हैं। बाजा को लाने के लिए राजा ने अपने कुछ आदमी भेजे, किन्तु पुरोहित धर्माकार तिवारी की धर्मपराणय पत्नी ने किसी अनिष्ट की आशंका के कारण बाजा का अपने यहाँ होना स्वीकार नहीं किया। तब विवश होकर राजा त्रिमलचन्द्र स्वयं धर्माकर तिवारी के यहाँ गये और बाजा की मांग की। तब उस धर्मपरायण महिला ने राजा से वचन लिया कि वह बाजा को मारेंगे नहीं साथ ही उन्हे अपना युवराज भी बनायेंगे। राजा ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बाजा को अभयदान दिया तथा बाजा को युवराज बनाये जाने का वचन भी दिया।

    राजा त्रिमलचन्द्र बाजा को अपने साथ ले गये और राजमहल में लाकर उन्हें युवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया। बाजबहादुर बडी धूम-धाम से युवराज बनाये गये। राजा ने राजदरबार में उन्हें कुँवर के नाम से सम्बोधित किया और अपने पास गद्दी पर बैठाकर कहा कि -‘‘बेटा मेरे बाद तू ही इस राज्य का राजा होगा।’’ तब से वह कुँवर बाजचन्द्र कहलाये। कुँवर बाजचन्द्र दरबार में बैठकर राजकाज सीखने लगे। राजा त्रिमलचनद्र ने 13 वर्ष (सन् 1595 से सन् 1608 तक) राज्य किया। सन् 1608 में राजा त्रिमलचन्द्र स्वर्ग सुधार गये। कुँवर बाजचन्द्र राजा बने।

    राजा बाजचनद्र का काल प्रगति का काल था। उनके कार्यकाल में तराई और भावर में सम्पन्नता और आजादी थी। राजकोष को नौ लाख रूपयो की आमदनी होती थी। चन्दों की आपसी फूट को उन्होंने शांत कर दिया था। इन्हीं राजा बाजबहादुर ने बाजपुर की स्थापना की, जो वर्तमान बाजपुर कस्बे से 4 किलो मी0 दूर पश्चिम दिशा में हैं तथा बाजपुर गॉव के नाम से जाना जाता हैं। नगर बाजपुर में चन्द राजाओं के द्वारा एक चौकी की स्थापना करायी गई। बाद में अंग्रेजो के शासनकाल में उसी के नजदीक एक शफाखाना खोला गया। राजस्व रिकार्ड में शफाखाना आज भी अंकित हैं।

    मुगलकाल में राजस्थान के राजपूत राजाओं से मुगलों का अनवरत युद्ध चल रहा था। राजस्थानी राजपूतों के परिवार विशेषकर स्त्रियाँ और बच्चे सुरक्षा की दृष्टि से अपने सेवकों के साथ राजस्थान से पलायन कर तराई में आकर बस गये। बुक्सा जनजाति उन्हीं राजपूतों के सेवकों की वंशज है। चन्द्रवंशीय राजाओं का क्षेत्र बिजनौर में बढापुरा रियासत तक रहा हैं। अंग्रेजी शासनकाल में बाजपुर में एक सब तहसील स्थापित की गई थी और उसके क्षेत्र को ‘खास स्टेट’ के नाम से जाना जाता था। खास सुपरिटेन्डेन्ट खाम स्टेट का प्रशासक था, जिसे व्यापक अधिकार प्राप्त थे। कहा जाता है कि तराई का यह क्षेत्र कई बार आबाद हुआ और कई बार उजड गया। आजादी से पूर्व तक यह सम्पूर्ण क्षेत्र पूर्णतः सघन जंगलो से भरा हुआ था। आबादी भी बिखरी हुई थी। छोटे-छोटे गॉवों के रूप में विशेष रूप से बुक्सों और बन्जारों के गॉव ही स्थित थे। सम्पूर्ण क्षेत्र हर प्रकार की असुविधाओं से ग्रस्त तथा घनें वनों से आच्छादित था। सम्पूर्ण जंगल खूंखार जंगली जानवरों की भ्रमण स्थली थी।

    राजा बाजबहादुर का वंशावृक्ष

    वंशावली से स्पष्ट हैं कि सांसद के0सी0सिंह ‘बाबा’ बाजपुर के संस्थापक राजा बाज बहादुर के वंश की एक कडी हैं। आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पं0 गोविन्द बल्लभ पंत ने पाकिस्तान से आये पुरूषार्थी भाईयों तथा श्रमिकों को तराई क्षेत्र में जमीनें आबंटित कीं। जिसके कारण सम्पूर्ण तराई क्षेत्र आबाद हुआ। उसी क्रम में बाजपुर का भी स्वरूप बदलता चला गया। घने जंगलों को सरकारी अनुदान हरे-भरे खेतों में बदला गया। यहाँ की जमीन सोना उगलने लगी। गन्ना मुख्य फसल के रूप में उत्पादित किया गया, जिसे दूरवर्ती चीनी मिलों रामपुर व काशीपुर में आपूर्ति किया जाता था। काशीपुर और रामपुर के आलावा कोई चीनी मिल न होने के कारण गन्ना उत्पादक किसान बहुत परेशान थे। कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जनक होती है। गन्ने की प्रचुर उपलब्धता और आपूर्ति होने में परेशानी के कारण बाजपुर क्षेत्र के किसानों में जागरूकता पैदा हुई। इस जागरूकता को पैदा करने में भारतीय सेना के उन भूतपूर्व सैनिकों को और अधिकारियों का भी स्मरणीय सहयोग रहा, जिन्हें भारत सरकार द्वारा बाजपुर परिक्षेत्र में भूमि आबंटित की गई थी। किसानों की प्रबल मांग और विकास के दृष्टिगत भारत रत्न पं0 गोविन्द बल्लभ पंत जी के आर्शीवाद और अविस्मरणीय सहयोग से बाजपुर क्षेत्र में बाजपुर में ही प्रथम सहकारी चीनी मिल की स्वीकृति प्राप्त हुई। 16 फरवरी ,1959 को बाजपुर सहकारी चीनी मिल का शुभारम्भ हुआ।

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  • शैक्षिक प्रगति

    चीनी मिल की स्थापना ने इस क्षेत्र की कायाकल्प कर दी। गन्ना उत्पादकों ने विकास के लिये गन्ना मूल्य में कटौती करानी प्रारम्भ की, जिससे क्षेत्र में सडकों का जाल बिछ गया। शिक्षा फण्ड की कटौती से क्षेत्र में अनेक विद्यालय स्थापित हुए। सन् 1958 में बाजपुर एक जूनियर हाई स्कूल की स्थापना हुई, जो आज बाजपुर इण्टर कालेज के नाम से विख्यात है। 1960 में हाई स्कूल और 1964 में इण्टर स्तर तक की मान्यता के बाद 30 किमी0 की परिधि की शैक्षिक क्रान्ति में इस विद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सहकारी गन्ना समिति, बाजपुर की आर्थिक सहायता से सृजित यह विद्यालय प्रदेश में सर्वाधिक विषय की शैक्षिक सुविधा प्रदान करने वाला तथा जनजाति शिक्षा के प्रसार में 1968 से मुख्य भूमिका निभाता आ रहा हैं। वर्तमान में राजकीय महाविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा के क्षेत्र में योगदान कर रही है। सहकारी गन्ना विकास समिति और चीनी मिल, बाजपुर के सहयोग से इस क्षेत्र में एक बी0सी0एस0एफ0 इण्टर कालेज, सैंट मेरी हाई स्कूल, आदर्श कन्या हाई स्कूल तथा राजकीय कन्या इण्टर कालेज की स्थापना हुई। आधुनिक समय में बाजपुर क्षेत्र शैक्षिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्र हैं। हर पाँच किलोमी0 की दूरी हाई स्कूल और इण्टर कालेज स्थापित है।


  • औद्योगिक क्रान्ति

    चीनी मिल इस क्षेत्र की एक मात्र औद्योगिक इकाई थी, इसके बाद वर्ष 1976 में बाजपुर चीनी मिल में सह इकाई के रूप में आसवनी की स्थापना हुई। विगत तीन दशकों में पेपर मिल, सीड प्लांट, स्टोन क्रशर, पेप्सिको इंडिया आदि की स्थापना के फलस्वरूप जहॉ क्षेत्रीय बेरोजगार युवकों को रोजगार सुलभ हुआ हैं, वही क्षेत्रीय आर्थिक विकास की दौड में भी अग्रिम पंक्ति पर आ गया हैं।

    बाजपुर का क्षेत्र भारतवर्ष में प्रगतिशील कृषि के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र का सीड उत्पादन भारतवर्ष में ख्याति प्राप्त है। बाजपुर क्षेत्र की प्रगति का इतिहास चीनी मिल की स्थापना से प्रारम्भ होता है, जिसने बाजपुर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रगतिशील, कर्मठ कृषक वर्ग के साथ ही बाजपुर क्षेत्र को विकास के उच्च शिखर पर पहॅुचाने में राजनैतिक नेतृत्व के रुप में पं0 नारायण दत्त तिवारी जी का विशेष योगदान रहा है।